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परिचय (रवि रौशन कुमार)

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पढ़ाई, नौकरी और साहित्य

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आज के समय में पढ़ा-लिखा होना सफलता की पहली शर्त माना जाती है। गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी, रीजनिंग जैसे विषयों में दक्षता व्यक्ति को नौकरी दिलाने में सहायक होती है। डिग्रियाँ, प्रमाणपत्र और अंकों के आधार पर व्यक्ति अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य गढ़ लेता है। लेकिन क्या केवल इतना ही पर्याप्त है? क्या एक सफल नौकरीपेशा व्यक्ति का अर्थ एक समझदार, संवेदनशील और सामाजिक मनुष्य होना भी है? मेरा अनुभव कहता है - नहीं। अक्सर देखने को मिलता है कि अत्यंत शिक्षित व्यक्ति भी व्यवहारिक समझ, सामाजिक संवेदना और मानवीय दृष्टि के अभाव में जीवन के कई मोड़ों पर असहज दिखाई देता है। इसके विपरीत, अनेक बार एक अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा लेकिन अनुभवी व्यक्ति जीवन की जटिलताओं को सहजता से समझ लेता है। उसके निर्णयों में जमीन से जुड़ा विवेक, व्यवहार में अपनापन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना स्पष्ट दिखती है। यहीं एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है- क्या हमारी औपचारिक शिक्षा हमें सामाजिक और मानवीय रूप से भी समृद्ध बना पा रही है? आम तौर पर यह तर्क दिया जाता है कि यदि व्यक्ति व्यवहारिकता, सामाजिकता और जीवन-बोध की चिंता करने लगे, त...

महात्मा गांधी का शिक्षा-दर्शन

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            जब हम महात्मा गांधी का नाम सुनते हैं , तो हमारे मन में आज़ादी की लड़ाई , सत्य और अहिंसा की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गांधीजी बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी बहुत गहराई से सोचते थे ? उनका मानना था कि देश को मजबूत बनाने की शुरुआत बच्चों की सही शिक्षा से होती है। गांधीजी कहते थे कि शिक्षा केवल किताबें पढ़ लेने या परीक्षा पास कर लेने का नाम नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है , जो बच्चे को अच्छा इंसान , आत्मनिर्भर नागरिक और समाज के काम आने वाला व्यक्ति बनाए। शिक्षा क्यों ज़रूरी है ?             गांधीजी का सपना था एक ऐसा समाज जहाँ कोई किसी का शोषण न करे , सभी मिल-जुलकर काम करें और हर व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो। वे मानते थे कि यह सपना तभी साकार हो सकता है , जब हर बच्चा शिक्षित हो। बिना शिक्षा के न तो व्यक्ति आगे बढ़ सकता है और न ही समाज। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को जीवन से जोड़ने पर बल दिया। गांधीजी बच्चों को 3H की शिक्षा देना चाहते थे - Head ( मस्तिष्क) – सोचने , समझने और...

निपुण भारत कार्यक्रम

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“निपुण” शब्द का हिंदी में अर्थ कुछ करने में माहिर होना अथवा प्रवीण होने से है। निपुण भारत मिशन का मुख्य उद्देश्य 2026-27 तक सभी बच्चों को ग्रेड 3 के अंत में मौलिक साक्षरता और गणितीय कौशल प्रदान करना है।  निपुण भारत का पूरा नाम National Initiative for Proficiency in Reading with Understanding and Numeracy  है। शिक्षा मंत्रालय ने निपुण (रीडिंग विथ अंडरस्टैंडिंग और न्यूमेरेसी के लिए राष्ट्रीय पहल) भारत योजना की शुरुआत की है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का हिस्सा है। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनात्मक सुधारों का मार्ग प्रस्तुत करने का उद्देश्य रखती है।  रीडिंग के समझ और न्यूमेरेसी में प्रवीणता के लिए राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि सभी बच्चों को ग्रेड 3 के अंत तक मौलिक साक्षरता और गणितीय ज्ञान होना चाहिए। यह 3 से 9 वर्ष के आयु समूह के बच्चों की सीखने की आवश्यकताओं को कवर करने का उद्देश्य रखती है। नई शिक्षा नीति - 2020  के सफलतापूर्वक कार्यान्वयन के लिए 5 जुलाई 2021 को “निपुण भारत कार्यक्रम” की शुरुआत की ग...

पुस्तक समीक्षा

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  पर्यावरणीय चुनौतियाँ : प्रबंधन और समाधान लेखक : रवि रौशन कुमार विषय : पर्यावरण अध्ययन / पर्यावरण संरक्षण वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब पर्यावरणीय संकट मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है , ऐसे समय में “ पर्यावरणीय चुनौतियाँ : प्रबंधन और समाधान” जैसी पुस्तक का प्रकाशन अत्यंत प्रासंगिक , समयोचित और विचारोत्तेजक है। यह पुस्तक न केवल पर्यावरणीय समस्याओं की गहन पड़ताल करती है , बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान और संरक्षण के उपाय भी प्रस्तुत करती है। पुस्तक की अनुक्रमणिका स्वयं इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने विषय को बहुआयामी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास किया है। पुस्तक की भूमिका में संकट में प्रकृति की संकल्पना के माध्यम से पर्यावरणीय असंतुलन के मूल कारणों को स्पष्ट किया गया है। इसके पश्चात जलवायु परिवर्तन , प्राकृतिक आपदाएँ , पहाड़ों पर संकट तथा जल संकट जैसे अध्याय वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर उभरती समस्याओं को वैज्ञानिक तथ्यों और सरल भाषा में सामने रखते हैं। जहरीला का होता जलस्रोत , तेल रिसाव , प्लास्टिक प्रदूषण और नदियों के अस्तित्व पर संकट जैसे अध्...

प्रधान शिक्षक: एक प्रबंधक के रूप में

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 प्रधान शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं रही है; आज वह एक प्रबंधक, प्रशासक, डेटा एंट्री ऑपरेटर और एक प्रभावी शिक्षक - इन सभी भूमिकाओं का एक जटिल मिश्रण बन गया है। रिपोर्ट तैयार करने, मोबाइल ऐप पर जानकारी अपडेट करने, सर्वे करने, विभागीय बैठकों में भाग लेने आदि की निरंतर मांगों के बीच, शिक्षण कार्य के लिए समय निकालना एक चुनौती बन गया है| ​लेकिन क्या इन सब जिम्मेदारियों के बीच भी शिक्षण की गुणवत्ता को  बनाए रखना और उसके लिए समय निकालना संभव है? हाँ, यह संभव है, यदि प्रधान शिक्षक कुछ रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाएं: ​प्रधान शिक्षक: चुनौतियों के बीच शिक्षण के लिए समय प्रबंधन ​एक प्रधान शिक्षक के रूप में, आपके कंधों पर कई जिम्मेदारियां हैं - प्रशासनिक कार्यों से लेकर शिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने तक। यह सच है कि रिपोर्ट, सर्वे, बैठकें और डिजिटल अपडेट जैसी चीजें आपके दिन का एक बड़ा हिस्सा ले लेती हैं। लेकिन इन सब के बावजूद, शिक्षण कार्य के लिए समय निकालना न केवल संभव है, बल्कि यह आपकी प्राथमिक जिम्मेदारी भी है। आइए देखें कि आप अपनी तमाम दैनिक जिम्मेदारियों के बीच शिक्षण के लिए...

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