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Showing posts from June, 2021

पर्यावरण शिक्षा की प्रासंगिकता

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       भारतीय सभ्यता के आरम्भ से ही पर्यावरण को सुरक्षित रखने की जागरूकता लोगों में मौजूद थी। वैदिक एवं वैदिककाल के बाद का इतिहास इस बात का साक्षी है लेकिन आधुनिक काल में, विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद से, आर्थिक प्रगति को उच्च प्राथमिकता मिलने के कारण, पर्यावरण कुछ कम महत्त्वपूर्ण स्थान पर रह गया। केवल 1972 में पर्यावरणीय योजना एवं सहयोग के लिये राष्ट्रीय कमेटी के गठन के लिये कदम उठाए गए जो धीरे-धीरे पर्यावरण का अलग विभाग बना और 1985 में यह पूर्णरूप से पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के रूप में परिवर्तित हुआ। वर्तमान में इस मंत्रालय को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नाम से जाना जाता है। शुरूआत में भारत के संविधान में पर्यावरण को बढ़ावा देने या उसके संरक्षण के लिये किसी प्रकार के प्रावधान नहीं थे। लेकिन 1977 में हुए 42वें संविधान संशोधन में कुछ महत्त्वपूर्ण धाराएँ जोड़ी गई जो सरकार पर एक स्वच्छ एवं सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपती है।     प्रत्येक मनुष्य यदि ये अच्छी प्रकार से समझे कि किये गये कार्यो से ही पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है...

बिहार के नियोजित शिक्षक मनवा रहे हैं अपनी प्रतिभा का लोहा

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  देश  भर में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बड़े पैमाने पर शिक्षकों की बहाली हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार प्रत्येक 30 बच्चों पर एक शिक्षक की नियुक्ति के निर्देश के आलोक में सभी राज्यों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई। इस कड़ी में बिहार में भी शिक्षक नियोजन का कार्य प्रारम्भ हुआ लेकिन यहां 2011 से पहले तक कोई शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित नहीं की गई और ‘सर्टिफिकेट लाओ, नौकरी पाओ’ के तर्ज पर बहाली हुई। बाद में इन्हें जैसे-तैसे दक्षता परीक्षा में उत्तीर्ण करवा कर नीतीश सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा बचाई। अब तक चार लाख से भी अधिक नियोजित शिक्षक बिहार में कार्यरत् है। आश्चर्य की बात यह है कि अभी भी बिहार में पौने तीन लाख शिक्षकों की जरूरत है। फिर भी नीतीश सरकार बहाली से लेकर वेतन वृद्धि जैसे तमाम प्रक्रिया का श्रेय खुद लेते दिख जाते हैं। जबकि शिक्षकों की नियुक्ति केन्द्र के दिशानिर्देश के आलोक में हुई थी। वर्तमान सरकार के अलावा  कोई अन्य सरकार भी होती तो उसे शिक्षकों की बहाली करनी ही पड़ती। बिहार की शिक्षा व्यवस्था नियोजित शिक्षकों के दम पर ही चल रही है,...

आने वाली पीढ़ी को करना होगा भारी संकटों का सामना?

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जैसा परिवेश हमें अपने पूर्वजों से मिला था क्या आने वाली पीढ़ी को हम वैसा ही परिवेश सौंपने को तैयार हैं? उत्तर निश्चित तौर पर 'ना' ही होगा, क्योंकि हमने विकास के नाम पर इतने गैर जिम्मेदार कार्यों को अंजाम दिया है जिससे यह पृथ्वी रहने लायक नहीं रह गयी है। ग्लोबल वॉर्मिंग के फलस्वरूप जलवायु परिवर्तन तथा इससे उत्पन्न विभिन्न समस्याएं यथा संकटग्रस्त प्रजातियाँ, जल संकट, कार्बन उत्सर्जन, विभिन्न प्रकार की बीमारियां आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त हिम स्खलन, समुद्री चक्रवात, बाढ़ और सूखे की बारम्बारता में वृद्धि आदि विश्व के लिए चुनौती बन चुकी है। दुनियां भर के देश इन खतरों से चिंतित नजर आ रही है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर समय - समय पर इन समस्याओं के निदान हेतु प्रयास भी किए जा रहे हैं। विगत तीन दशकों से दुनियां भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चर्चाएं हो रही है। सन् 1992 में प्रथम पृथ्वी सम्मेलन से लेकर COP-13 की हालिया बैठक तक विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर चर्चाएं हुई हैं। विकास की प्रक्रिया में मानव ने अपने पर्यावरण को इतना क्षति पहुंचाया है कि जिसे ठीक करने के लिए विस्तृत सामूह...