महात्मा गांधी का शिक्षा-दर्शन


           जब हम महात्मा गांधी का नाम सुनते हैं, तो हमारे मन में आज़ादी की लड़ाई, सत्य और अहिंसा की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गांधीजी बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी बहुत गहराई से सोचते थे? उनका मानना था कि देश को मजबूत बनाने की शुरुआत बच्चों की सही शिक्षा से होती है। गांधीजी कहते थे कि शिक्षा केवल किताबें पढ़ लेने या परीक्षा पास कर लेने का नाम नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है, जो बच्चे को अच्छा इंसान, आत्मनिर्भर नागरिक और समाज के काम आने वाला व्यक्ति बनाए।

शिक्षा क्यों ज़रूरी है?






            गांधीजी का सपना था एक ऐसा समाज जहाँ कोई किसी का शोषण न करे, सभी मिल-जुलकर काम करें और हर व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो। वे मानते थे कि यह सपना तभी साकार हो सकता है, जब हर बच्चा शिक्षित हो। बिना शिक्षा के न तो व्यक्ति आगे बढ़ सकता है और न ही समाज। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को जीवन से जोड़ने पर बल दिया।

गांधीजी बच्चों को 3H की शिक्षा देना चाहते थे -

  • Head (मस्तिष्क)सोचने, समझने और सही-गलत पहचानने की शक्ति
  • Hand (हाथ) काम करने का कौशल, मेहनत और हुनर
  • Heart (हृदय) सच्चाई, करुणा, सहयोग और प्रेम

उनका कहना था कि अगर पढ़ाई से केवल दिमाग तेज हो और दिल व हाथ खाली रह जाएँ, तो ऐसी शिक्षा अधूरी है।

            गांधीजी भारतीय शिक्षा को प्यार से द ब्यूटीफुल ट्री” (सुंदर पेड़) कहते थे। उनका मानना था कि पुराने समय में भारत की शिक्षा गाँवों, समाज और जीवन से जुड़ी हुई थी। बच्चे अपने आसपास के कामों :- खेती, बुनाई, शिल्प के ज़रिये सीखते थे। लेकिन अंग्रेज़ों के समय में शिक्षा केवल नौकरी पाने तक सिमट गई। पढ़े-लिखे लोग मेहनत के काम से दूर होने लगे और समाज में दूरी बढ़ने लगी। गांधीजी इस शिक्षा से खुश नहीं थे। इसी सोच से 1937 में गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा (नई तालीम) की बात रखी। इसमें उन्होंने कहा—

  •     7 से 14 साल तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मिले
  •     पढ़ाई मातृभाषा में हो
  •     हर बच्चा कोई एक काम या शिल्प ज़रूर सीखे
  •     पढ़ाई और काम साथ-साथ चलें

            गांधीजी चाहते थे कि बच्चे पढ़ते हुए ही सीखें कि चीज़ें कैसे बनती हैं, मेहनत का क्या महत्व है और अपने पैरों पर कैसे खड़ा हुआ जाता है। गांधीजी का मानना था कि करके सीखना” सबसे अच्छा तरीका है। ऐसी पढ़ाई बच्चे को बोझ नहीं लगती, बल्कि सीखना मज़ेदार बन जाता है। जैसे :-

  •        खेती से गणित और विज्ञान समझना
  •        बुनाई से धैर्य और गणना सीखना
  •        शिल्प से कला और रचनात्मकता विकसित करना

आज के समय में गांधीजी की सीख

आज बहुत से बच्चे पढ़-लिख तो जाते हैं, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि आगे क्या करें। डिग्रियाँ हैं, पर काम नहीं। ऐसे समय में गांधीजी की बात और भी सही लगती है। अगर पढ़ाई के साथ हुनर सिखाया जाए, तो बच्चा आत्मनिर्भर बन सकता है। साथ ही, आज दुनिया में बढ़ती हिंसा, लालच और नफ़रत के बीच गांधीजी की नैतिक शिक्षा हमें अच्छा इंसान बनने की सीख देती है।

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Ravi Raushan Kumar

 

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