पढ़ाई, नौकरी और साहित्य
आज के समय में पढ़ा-लिखा होना सफलता की पहली शर्त माना जाती है। गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी, रीजनिंग जैसे विषयों में दक्षता व्यक्ति को नौकरी दिलाने में सहायक होती है। डिग्रियाँ, प्रमाणपत्र और अंकों के आधार पर व्यक्ति अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य गढ़ लेता है। लेकिन क्या केवल इतना ही पर्याप्त है? क्या एक सफल नौकरीपेशा व्यक्ति का अर्थ एक समझदार, संवेदनशील और सामाजिक मनुष्य होना भी है? मेरा अनुभव कहता है - नहीं।
अक्सर देखने को मिलता है कि अत्यंत शिक्षित व्यक्ति भी व्यवहारिक समझ, सामाजिक संवेदना और मानवीय दृष्टि के अभाव में जीवन के कई मोड़ों पर असहज दिखाई देता है। इसके विपरीत, अनेक बार एक अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा लेकिन अनुभवी व्यक्ति जीवन की जटिलताओं को सहजता से समझ लेता है। उसके निर्णयों में जमीन से जुड़ा विवेक, व्यवहार में अपनापन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना स्पष्ट दिखती है। यहीं एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है- क्या हमारी औपचारिक शिक्षा हमें सामाजिक और मानवीय रूप से भी समृद्ध बना पा रही है?
आम तौर पर यह तर्क दिया जाता है कि यदि व्यक्ति व्यवहारिकता, सामाजिकता और जीवन-बोध की चिंता करने लगे, तो उसकी पढ़ाई प्रभावित होगी। लेकिन मेरा मानना है कि यह सोच अधूरी है। पढ़ाई और जीवन-बोध एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यदि शिक्षा को सही दिशा दी जाए, तो यह केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि बेहतर मनुष्य बनने की प्रक्रिया भी बन सकती है।
यहीं साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि व्यक्ति साहित्य से प्रेम करता है और साहित्यिक पुस्तकों से अपनी दोस्ती बनाए रखता है, तो उसके भीतर सहानुभूति, संवेदनशीलता, सहृदयता और आलोचनात्मक चिंतन जैसे गुण स्वतः विकसित होते हैं। साहित्य हमें दूसरों के दुख को महसूस करना सिखाता है, समाज के अंतर्विरोधों से परिचित कराता है और हमें प्रश्न करना सिखाता है - बिना कटुता के, बिना अहंकार के।
कविता, कहानी, उपन्यास और निबंध केवल शब्दों का खेल नहीं होते, वे जीवन के अनुभवों का सार होते हैं। वे हमें भीतर से मानवीय बनाते हैं। यही कारण है कि जो व्यक्ति निरंतर अध्ययन करता रहता है- विशेषकर साहित्य का; उसके भीतर मानवीय मूल्यों का क्षरण नहीं होता, चाहे वह किसी भी पद पर हो या किसी भी व्यवसाय में क्यों न हो।
अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि मनुष्य बनना होना चाहिए। और इस अधूरे उद्देश्य को पूरा करने में साहित्य हमारी सबसे विश्वसनीय संगत है।
©रवि रौशन कुमार
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